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चर्चित आलोचक वीरेंद्र यादव का निधन, साहित्य जगत में शोक की लहर

लखनऊ। प्रेमचंद संबंधी बहसों और 1857 के विमर्श पर लेखन के लिए से चर्चित आलोचक वीरेंद्र यादव का शुक्रवार को हृदय गति रुकने से निधन हो गया। उन्होंने इंदिरा नगर सी ब्लाक में अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके भाई नागेंद्र प्रताप ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार शनिवार को सुबह 10 बजे बैकुंठ धाम में किया गया जाएगा।
वीरेंद्र यादव का जन्म पांच मार्च, 1950 को जौनपुर में जलालपुर के निकट गांव में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए किया था। उनकी छात्र जीवन से ही वामपंथी बौद्धिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी रही। प्रगतिशील लेखक संघ से अंत समय तक जुड़े रहे। उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष मंडल के सदस्य रहे। उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम में नौकरी भी की। ‘प्रयोजन’ पत्रिका का संपादन भी किया। जान हर्सी की पुस्तक ‘हिरोशिमा’ का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया। साहित्यिक-सांस्कृतिक विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन भी किया। उनका ‘राग दरबारी’ उपन्यास पर केंद्रित विनिबंध इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली के एम.ए. पाठ्यक्रम में शामिल है। उनका ‘नवें दशक के औपन्यासिक परिदृश्य’ पर विनिबंध ‘पहल पुस्तिका’ में प्रकाशित है। उन्हें आलोचनात्मक अवदान के लिए वर्ष 2001 के ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ से समादृत किया गया था। राकेश वेदा ने बताया वीरेंद्र आलोचनात्मक व साहित्य-सामाजिक रचनाओं में ‘विवाद नहीं हस्तक्षेप’, ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’, ‘हिंदी उपन्यास की सत्ता’, ‘उपन्यास और देश एवं विमर्श और व्यक्तित्व’ प्रमुख हैं।
उनकी रचनाएं केवल तकनीकी आलोचना तक सीमित न रहकर समाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विमर्श को भी अपना विषय बनाती थीं। उनके निधन से साहित्य दुनिया ने एक महत्वपूर्ण चिंतक और मार्गदर्शक और मैंने पांच दशकों तक साथ रहे एक गंभीर सहयात्री एवं दोस्त खो दिया है। समालोचक प्रो. नलिन रंजन सिंह ने बताया कि वीरेंद्र यादव की रचनाएं हिंदी साहित्य में आलोचनात्मक विमर्श को नई दिशा देने वाली मानी जाती हैं। आलोचना में उन्होंने पाठ, समाज, राजनीति और संस्कृति के बीच के गहन अंतसंर्बंधों को प्रकट किया।

प्रगतिशील लेखक संघ और प्रयोजन से जुड़ाव
वे प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) से लंबे समय तक जुड़े रहे। उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के वे लंबे समय तक सचिव रहे। उन्होंने प्रयोजन पत्रिका का संपादन भी किया और यह संपादन उनकी पहचान का एक बड़ा स्तंभ रहा। वीरेंद्र यादव की आलोचना सिर्फ पुस्तक समीक्षा नहीं थी- वह समाज, इतिहास और सत्ता-संरचना से संवाद करती आलोचना थी।
वे कथा-आलोचना में लगातार सक्रिय रहे। उनका लेखन प्रेमचंद संबंधी बहसों और 1857 के विमर्श पर हस्तक्षेपकारी माना जाता है—यानी वे बहस को दिशा देने वाले आलोचक थे। उनके कई लेखों के अंग्रेजी और उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित हुए। उपलब्ध जानकारी के आधार पर उनकी कुछ चर्चित किताबें/काम..उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता (उपन्यास-केंद्रित आलोचना), उपन्यास और देस (उपन्यास आलोचना की चर्चित किताब),प्रगतिशीलता के पक्ष में (प्रगतिशील साहित्य/आंदोलन केंद्रित) , जॉन हर्सी की हिरोशिमा का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद (यह उनके अनुवाद-कार्य का बड़ा योगदान माना जाता है)। इसके अलावा उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण कृतियों पर भूमिका/प्रस्तावना लेखन भी किया।

वीरेंद्र जी की कलम से बहुत कुछ आना बाकी था : उर्मिलेश

आलोचक वीरेंद्र यादव के निधन पर जाने माने पत्रकार-लेखक उर्मिलेश ने द लेंस से बात करते हुए कहा, स्तब्ध हूं! कुछ ही देर पहले प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के निधन की सूचना मिली. कुछ सप्ताह पहले फोन पर बातचीत हुई थी। स्वास्थ्य समस्या की भी संक्षिप्त चर्चा हुई, उनका आज अकस्मात चले जाना हम सबके लिए बहुत बड़ी क्षति है। अभी उन्हें होना चाहिए था। बहुत जरूरी थे वह हमारे समाज, हिंदी साहित्य और विचार जगत के लिए। हिंदी की साहित्यिक आलोचना को वीरेंद्र जी ने नया प्रगतिशील परिप्रेक्ष्य दिया. कई मायनों में यह हिंदी की कथित मार्क्सवादी आलोचना से भिन्न था, अपनी नयी दृष्टि से उन्होंने वर्ण-संकीर्णताओं में पिचकी हिंदी की नकली प्रगतिशीलता को बहुत तथ्यात्मक ढंग से बेनकाब किया. इससे हिंदी आलोचना के कई नये-पुराने बड़े दिग्गजों का नकली प्रगतिशील आभामंडल धाराशायी होता दिखा। अभी वीरेंद्र जी की कलम से बहुत कुछ आना बाकी था।

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