विद्यार्थियों को दिया शास्त्रीय संगीत का व्यावहारिक प्रशिक्षण
लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ में संगीत शिक्षा को समृद्ध करने तथा विद्यार्थियों को प्रतिष्ठित संगीत विशेषज्ञों से प्रत्यक्ष प्रशिक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से स्वर वाद्य विभाग एवं गायन विभाग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय कार्यशालाओं का शुक्रवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। 23 से 25 सितंबर तक आयोजित इन कार्यशालाओं में विद्यार्थियों को शास्त्रीय संगीत के विभिन्न सैद्धांतिक, तकनीकी एवं व्यावहारिक पक्षों का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया। कार्यशालाओं के दौरान विशेषज्ञ कलाकारों ने विद्यार्थियों के साथ प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करते हुए उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया तथा संगीत साधना एवं प्रस्तुति से जुड़े विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन प्रदान किया।
गायन विभाग द्वारा आयोजित कार्यशाला में प्रख्यात गायिका विदुषी अंजली मालकर ने राग बिलावल के प्रकार विषय पर विद्यार्थियों को प्रशिक्षण प्रदान किया। विदुषी अंजली मालकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रख्यात गायिका होने के साथ-साथ संगीत इतिहासकार, शोधकर्ता, लेखिका एवं शिक्षिका के रूप में सक्रिय हैं तथा ग्वालियर- जयपुर संगीत परंपरा से संबद्ध हैं।
कार्यशाला के दौरान उन्होंने देवगिरी बिलावल के अंतर्गत दो बंदिशों—ओम नमो शंकरा शंकरा तथा कौन तुम्हारे लागत कुँवर सँवारे गोरे—के माध्यम से आलाप, स्वर-विस्तार एवं प्रस्तुति के विभिन्न पक्षों को विद्यार्थियों को समझाया। इसके साथ ही अलहैया बिलावल एवं यमनी बिलावल में आलाप तथा पलटों का विस्तृत एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया। उन्होंने विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के बिलावल के स्वरूप, उनके पारस्परिक अंतर तथा गायन की विशिष्टताओं को उदाहरण सहित समझाया। इस दौरान उन्होंने विद्यार्थियों से संवाद स्थापित कर उनके प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं का समाधान किया तथा शास्त्रीय गायन से संबंधित विभिन्न विषयों पर विस्तार से चर्चा की। विद्यार्थियों को रागदारी संगीत के विभिन्न पक्षों को समझने के साथ-साथ उनके व्यावहारिक प्रयोग एवं प्रस्तुति का भी अवसर मिला।
स्वर वाद्य विभाग द्वारा आयोजित कार्यशाला में दिल्ली से आमंत्रित प्रख्यात सरोद वादिका एवं संगीत शोधकर्ता डॉ. चंद्रिमा मजूमदार ने विद्यार्थियों को सरोद वादन की तकनीक, रागदारी, वादन शैली तथा प्रस्तुति के विभिन्न पक्षों का प्रशिक्षण प्रदान किया। उल्लेखनीय है कि डॉ. चंद्रिमा मजूमदार ने भातखण्डे संगीत महाविद्यालय, लखनऊ से ही पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है।
तीन दिवसीय कार्यशाला के दौरान डॉ. मजूमदार ने विद्यार्थियों को राग श्याम कल्याण तथा उससे संबंधित एवं समीपवर्ती रागों जैसे कामोद एवं शुद्ध सारंग के स्वरूप एवं विशेषताओं से परिचित कराया। उन्होंने मध्य लय में दुगुन एवं चौगुन के माध्यम से आलाप एवं तानों का अभ्यास कराया तथा छोटी तान एवं बड़ी तान की प्रस्तुति एवं उनके प्रयोग की बारीकियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को रागों के स्वरूप की सूक्ष्म समझ विकसित करने के साथ-साथ सरोद वादन में आलाप, तान एवं लयकारी के संतुलित प्रयोग के संबंध में भी मार्गदर्शन प्रदान किया। कार्यशाला के दौरान विद्यार्थियों के साथ संवाद स्थापित करते हुए उनकी जिज्ञासाओं एवं प्रश्नों पर चर्चा की गई तथा उन्हें व्यक्तिगत रूप से आवश्यक सुझाव एवं मार्गदर्शन प्रदान किया गया।
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने दोनों विशेषज्ञ कलाकारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को प्रतिष्ठित एवं अनुभवी कलाकारों से प्रत्यक्ष रूप से सीखने का अवसर प्राप्त होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विदुषी अंजली मालकर एवं डॉ. चंद्रिमा मजूमदार ने अपने अनुभव, ज्ञान और वर्षों की साधना को विद्यार्थियों के साथ साझा कर इन कार्यशालाओं को सार्थक बनाया है। उन्होंने दोनों विशेषज्ञ कलाकारों के प्रति विश्वविद्यालय परिवार की ओर से हार्दिक आभार व्यक्त किया।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव अतुल कुमार ने कहा कि भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव का विषय है कि विद्यार्थियों को देश के प्रतिष्ठित संगीत कलाकारों एवं विषय विशेषज्ञों के सान्निध्य में सीखने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएं विद्यार्थियों को संगीत की बारीकियों को प्रत्यक्ष रूप से समझने और अनुभवी कलाकारों से सीखने का अवसर प्रदान करती हैं।
कार्यशालाओं का आयोजन प्रो. सृष्टि माथुर, विभागाध्यक्ष—गायन एवं स्वर वाद्य के संयोजन में किया गया। तीनों दिनों में विश्वविद्यालय के शिक्षक, विद्यार्थी, शोधार्थी एवं संबंधित विभागों के छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया। कार्यशालाओं के दौरान विशेषज्ञ कलाकारों और विद्यार्थियों के बीच हुआ संवाद एवं विचार-विमर्श कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। कार्यशालाओं के समापन पर विशेषज्ञ कलाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया गया तथा विद्यार्थियों ने प्राप्त प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन को अपनी संगीत साधना के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।




